चमत्कारी मंत्र: सुनने मात्र से संवर जाएंगे सात जन्म, हर दुख का हो जाएगा अंत

मंत्र

नमो स्तवन अनंताय सहस्त्र मूर्तये, सहस्त्रपादाक्षि शिरोरु बाहवे।

सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।।

जीवन में आने वाली किसी भी तरह कि बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए प्रतिदिन सुबह इस मंत्र का जाप करें।

मंत्र से होने वाले लाभ:

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था कि हर युग में इन नामों को पढ़ने या सुनने से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यदि प्रतिदिन इन एक हजार नामों का जाप किया जाए तो सभी मुश्किलें हल हो सकती हैं। विष्णु सहस्रनाम हिंदू धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय शैव और वैष्णवों को जोड़ने का कार्य करता है। विष्णु सहस्रनाम को अौर भी बहुत सारे नामों से जाना जाता है जैसे- शम्भु, शिव, ईशान और रुद्र। इससे ज्ञात होता है कि शिव अौर विष्णु में कोई अंतर नहीं है ये एक समान हैं।
विष्णु सहस्रनाम के जाप में बहुत सारे चमत्कार समाएं हैं। इस मंत्र को सुनने मात्र से संवर जाएंगे सात जन्म, सभी कामनाएं हो जाएंगी पूर्ण और हर दुख का हो जाएगा अंत।

THE MORNING PRAYER
There is a very powerful ritual that may be followed to increase your Divine power to increase wealth. When you get up from bed in the morning, the first thing one should do is to look at both the palms of the hands. Then at the tip of the fingers where dwells goddess Lakshmi and chant the mantra mentioned below. After chanting this mantra one should rub the hands, and take the power, energy and blessings on to the Face.

 

Karaagre Vasathe Lakshmee

Kara Madhye Saraswathii

Kara Moolethu Govindaha

Prabhaathe Kara Darshanam

 

 

karage_vasati

Meaning:   kara = hand; agra = tip; agre = at the tip; vasate = lives;LakshmiGoddess of wealth and consort of Lord Vishnu; madhye = in the middle; Saraswati = Goddess of education and learning; moola = base/corner;mooletu = at the base; GovindaH = (go + vinda) go = cattle; vinda = friend) Lord Govinda or Krishna; prabhate = early in the morning; darshanaH  = appearance (seeing).

Meaning:

On the tip of your hand lives Goddess Lakshmi; Goddess Saraswathi is in the middle of your hand (palm) and on the base of your hand resides Lord Govinda – in this manner you look at your palm early in the morning.

When you wake up in the morning, it is believed that you need to open your eyes by first looking at the tip of the hands, followed by the palm, then the base of the hands.

कराग्रे वसते लक्ष्मिः करमध्ये सरस्वति
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्

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ब्रह्माजी ने मनुष्यों कि रक्षा हेतु मार्कण्डेय पुराण में कुछ परमगोपनीय साधन-कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपायो का उल्लेख किया हैं, जिस्से साधारण से साधारण व्यक्ति जिसे माँ दुर्गा पूजा अर्चना के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं होने पर भी विशेष लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

 

माँ दुर्गा के इन मंत्रो का जाप प्रति दिन भी कर सकते हैं। पर नवरात्र में जाप करने से शीघ्र प्रभाव देखा गया हैं।

 

सर्व प्रकार कि बाधा मुक्ति हेतु:

 

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति संशयः॥

अर्थातः मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा- इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

किसी भी प्रकार के संकट या बाधा कि आशंका होने पर इस मंत्र का प्रयोग करें। उक्त मंत्र का श्रद्धा से जाप करने से व्यक्ति सभी प्रकार की बाधा से मुक्त होकर धन-धान्य एवं पुत्र की प्राप्ति होती हैं।

 

बाधा शान्ति हेतु:

 

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

अर्थातः सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।

 

विपत्ति नाश हेतु:

 

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थातः शरण में आये हुए दीनों एवं पीडितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीडा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।

 

पाप नाश हेतु:

 

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्। सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥

अर्थातः देवि! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मो से रक्षा करती है।

 

विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति हेतु:

 

करोतु सा : शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।

अर्थातः वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले।

 

भय नाश हेतु:

 

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते। भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु : सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥

अर्थातः सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्ति यों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है। कात्यायनी! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है। भद्रकाली! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयंकर और समस्त असुरों का संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल भय से हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है।

 

सर्व प्रकार के कल्याण हेतु:

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थातः नारायणी! आप सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। आपको नमस्कार हैं।

व्यक्ति दु:ख, दरिद्रता और भय से परेशान हो चाहकर भी या परीश्रम के उपरांत भी सफलता प्राप्त नहीं होरही हों तो उपरोक्त मंत्र का प्रयोग करें।
सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति हेतु:

पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

अर्थातः मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्‍‌नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो।

 

शक्ति प्राप्ति हेतु:

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि। गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थातः तुम सृष्टि, पालन और संहार करने वाली शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।

 

रक्षा प्राप्ति हेतु:

 

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन : पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

अर्थातः देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।

देह को सुरक्षित रखने हेतु एवं उसे किसी भी प्रकार कि चोट या हानी या किसी भी प्रकार के अस्त्र-सस्त्र से सुरक्षित रखने हेतु इस मंत्र का श्रद्धा से नियम पूर्वक जाप करें।

 

विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:

 

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥

 

अर्थातः देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।

समस्त प्रकार कि विद्याओं की प्राप्ति हेतु और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये इस मंत्रका पाठ करें।

 

प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु:

 

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव॥

अर्थातः विश्व की पीडा दूर करनेवाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पडे हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियों की पूजनीय परमेश्वरि! सब लोगों को वरदान दो।

 

आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति हेतु:

 

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

अर्थातः मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि मेरे शत्रुओं का नाश करो।

 

महामारी नाश हेतु:

 

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

अर्थातः जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा- इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो।

 

रोग नाश हेतु:

 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।

त्वामाश्रितानां विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥

अर्थातः देवि! तुमहारे प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवाछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।

 

विश्व की रक्षा हेतु:

 

या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

अर्थातः जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रतारूप से, शुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिये।

 

विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश हेतु:

 

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।

प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥

अर्थातः शरणागत की पीडा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत् की अधीश्वरी हो।

 

विश्व के पापताप निवारण हेतु:

 

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्य:

पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥

अर्थातः देवि! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत् का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी आदि बडे-बडे उपद्रवों को शीघ्र दूर करो।

 

विश्व के अशुभ तथा भय का विनाश करने हेतु:

 

यस्या: प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च हि वक्तु मलं बलं च।

सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥

अर्थातः जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत् का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का विचार करें।

 

सामूहिक कल्याण हेतु:

 

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्ति समूहमूत्र्या।

तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा :

अर्थातः सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगों का कल्याण करें।

 

dhanvantri

Dhanvantari is in ancient Hinduism considered to be the father of medicine and health. He is considered to be an Avatar of Vishnu and there are numerous references about him in the ancient Hindu scriptures like the Vedas and the Puranas.He is referred to as the physician of the Gods and the founder of what is known as Ayurvedic medicine.He is also said to be the first physician and surgeon.

Dhanvantari is also worshipped in India as the God of health and immortality. He is portrayed as holding the pot containing the nectar of immortality, and is said to be the preserver of the world from all diseases.
The Dhanvantari mantra is recited to remove fears and diseases, those wishing to improve their health and eradicate diseases recite this mantra.

 

Dhanvantari Mantra

English Translation

 

“Om Namo Bhagavate
Maha Sudharshana
Vasudevaya Dhanvantaraye;
Amrutha Kalasa Hasthaaya
Sarva Bhaya Vinasaya
Sarva Roka Nivaranaya
Thri Lokya Pathaye
Thri Lokya Nithaye
Sri Maha Vishnu Swarupa
Sri Dhanvantri Swarupa
Sri Sri Sri
Aoushata Chakra Narayana Swaha”

धन्वन्तरी मंत्र
ॐ नमो भगवते
महा सुदर्शना
वसुदेवा धन्वंताराया ;
अमृता कलसा हस्थाया
सर्व भय विनासाया
सर्व रोका निवारानाया
थ्री लोक्य पठाए
थ्री लोक्य निथाये
श्री महा विष्णु स्वरूपा
श्री धन्वन्तरी स्वरूपा
श्री श्री श्री
ओउषता चक्रा नारायणा स्वाह”

Meaning: We pray to the God, who is known as Sudarshana Vasudev Dhanvantari. He holds the Kalasha full of nectar of immortality. Lord Dhanvantri removes all fears and removes all diseases. He is the well wisher and the preserver of the three worlds. Dhanvantari is like Lord Vishnu, empowered to heal the Jiva souls. We bow to the Lord of Ayurveda.

 

2016-01-24_1440Gayatri

In the hindu methodology all the navagraha have relative movement with respect to the background of fixed stars in the zodiac. This includes the planets: Mars, Mercury, Jupiter, Venus, and Saturn, the Sun, the Moon, as well as positions in the sky, Rahu (north or ascending lunar node) and Ketu (south or descending lunar node).

Traditional Hindu astrologers castes in India are known to be major experts of Navagraha, many people would approach a hindu astrologer when they have problems and ask them on how to overcome them by performing certain rituals which involve worship of Navagraha to overcome ill effects.

So, we have to worship by these Navagrah Gaytri Siddh Mantra to overcome all the unknown bad effects.

प्रत्येक समय या काल में कोई न कोई गृह अनिष्टकारक रहता है | और उसके अनिष्टता के प्रभाव को को करने के लिए याचक को कोई न कोई उपाय कारण पडता है | अत: जो ग्रह अनिष्ट करता हो या जो ग्रह अनिष्टकारी हो उसके निमित्त उसी ग्रह के गायत्री मंत्र की 108 (एक सौ आठ) माला जपे व दशांश हवन करे | ऐसा करने से शांति मिलेगी व वह ग्रह आपको दुष्परिणाम के बजाय सुपरिणाम देगा | और इन मन्त्रों के प्रभाव से ग्रह दोष अगर हो तो उसका भी निवारण होता है |

 

सूर्य गायत्री मंत्र (Surya Gayatri Mantra)
 
ओम् भास्कराय विद्मिहे महातेजाय धीमहि |

तन्नो: सूर्य: प्रचोदयात ||

चंद्र गायत्री मंत्र (Chandra Gayatri Mantra)

ओम् क्षीरपुत्राय विद्मिहे मृतात्वाय धीमहि |
तन्नम्चंद्र: प्रचोदयात ||

 

भौमा गायत्री मंत्र (Mangala Gayatri Mantra)
ओम् अंगारकाय विद्मिहे वाणेशाय धीमहि |
तन्नो: भौम प्रचोदयात ||

 

बुध गायत्री मंत्र (Budha Gayatri Mantra)
ओम् सौम्यरुपाय विद्मिहे वाणेशाय धीमहि |
तन्नो: बुध: प्रचोदयात ||

 

बृहस्पति गायत्री मंत्र (Brihaspati Gayatri Mantra)
ओम् गुरुदेवाय विद्मिहे वाणेशाय धीमहि |
तन्नो: गुरु: प्रचोदयात ||
ओम् हूँ सं क्रां सौ: गुरुदेवपरमात्मने नमः इति मूलमंत्र

 

शुक्र गायत्री मंत्र (Shukra Gayatri Mantra)
ओम् भृगुसुताय विद्मिहे दिव्यदेहाय धीमहि |
तन्नो: शुक्र: प्रचोदयात ||

 

शनि गायत्री मंत्र (Shani Gayatri Mantra)
ओम् शिरोरुपाय विद्मिहे मृत्युरुपाय धीमहि |
तन्नो: सौरि: प्रचोदयात ||

 

राहु गायत्री मंत्र (Rahu Gayatri Mantra)
ओम् शिरोरुपाय विद्मिहे अमृतेशाय धीमहि |
तन्नो: राहु: प्रचोदयात ||

 

केतु गायत्री मंत्र (Ketu Gayatri Mantra)
ओम् गदाहस्ताय विद्मिहे अमृतेशाय धीमहि |
तन्नो: केतु: प्रचोदयात ||